| पुढच्याला मागे खेचनारे आम्ही |
| विजेत्यांचे नांगे ठेचनारे आम्ही |
| नाही कुठेच आमच्या हक्काचा बाग |
| दुसर्याचीच फ़ूले वेचनारे आम्ही. |
| बुध्दीने काढतो निर्बुध्दांची सोंगे |
| अध्यात्माला दूर फ़ेकनारे आम्ही. |
| आम्हासाठी आणेल घबाड त्याच्या |
| सरणावरी हात शेकनारे आम्ही. |
| अंगात आमच्या बाणा कर्तव्याचा |
| दुबळ्यांची बोटे चेपनारे आम्ही. |
Friday, September 14, 2012
आम्ही
तू म्हणतेस मज, की, चित्तचोर मी
| तू म्हणतेस मज, की, चित्तचोर मी |
| लोक म्हणती मज, असे बंडखोर मी. |
| दिसलो जरी असा, निर्विकार मी |
| असतो खोल आत, भावविभोर मी. |
| नाही दिप येथे, तुझ्या स्वागताला |
| काळजास केले, ही चंद्रकोर मी. |
| हास दु:खा उगाच, हास तुही आता |
| तुजसवे लावतो, पुन्हा एक जोर मी. |
| नको उगा बोलू, काही ही भलते |
| झाडाहून कसा, होईन थोर मी? |
| जरी तुझ्यासाठी, झालो मी बुजुर्ग |
| मनात एक उनाड, दडविले पोर मी. |
फ़सवूण आज गेले, सारेच पावसाळे !
| फ़सवूण आज गेले, सारेच पावसाळे |
| भोगावयास आले, नुसतेच हे उन्हाळे. |
| मेल्यावरीच येतो पाऊस आसवांचा |
| जगण्यात सांग कोठे लपतात हे जिव्हाळे? |
| वाकून चाल तू ही, लढण्यास जिंदगीशी |
| पाण्याखाली विनम्र झुकती जसे लव्हाळे. |
| नेकीने चालतो ही, सत्याची वाट अवघी |
| माझाच जीव मजला तरी पुन्हा न्यहाळे |
| जाता बुडूनी सांज पोटात सागराच्या |
| माझे अबोल गाणे पाण्यावरी खळाळे. |
मने करुन फूलांची......!
| लहानांसाठी कधी मने, करुन फ़ूलांची लहान व्हावे |
| उपकाराचे हात देऊन, मरणा अंती महान व्हावे. |
| सुख दु:खाची करुन वारी, गाणे येईल तुमच्या दारी |
| मंतरलेल्या शब्दांसाठी, कधी गाण्याची तहान व्हावे. |
| झाडाला कधी नसते दु:ख, काळजाला सांगून द्यावे |
| अन्यायात कधी दुर्बलांच्या तलवारीची सहाण व्हावे. |
| सांग कथा ती प्रत्यकाला, जय नावाच्या पराजयाची |
| लढणार्यास ही मौनाची भाषा त्यांची आव्हान व्हावे. |
| ना देता आले सुख कधी, तरी द्यावे असे दिलासे की, |
| आनंदाच्या अश्रूमध्ये सवंगड्याचे नहाण व्हावे. |
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| कठिण शब्द येता :----- |
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| सहाण = धार लावण्याचा दगड. |
| जय नावाचा पराजय = महाभारतावरील विष्लेशक कथेचा संदर्भ. |
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कुड
| तुझं खरं की माझं खरं |
| मनाचा भुंगा जीवाला या |
| असं रोज कुरतडत राहतो. |
| सत्याचं -असत्याचं मनात |
| जुंपतं रोज तुंबळ... अन- |
| कुणीतरी अज्ञात रक्षस |
| सुखलेल्या या जख्मांना |
| पुन्हा फ़ोडत राहतो. |
| कसं ! जगावं तरी कसं? |
| बाहेरच्या या जगात |
| नाही कुणालाच कळत |
| असा मी का चिडत राहतो. |
| कुण्या जन्माच हे पाप, |
| कि, जगण्याचा हा शाप? |
| कुणी नसताना ही माझा मी |
| मलाच, का कुडत राहतो? |
अता वाकून ये आभाळा
| अता वाकून ये आभाळा |
| जराशी होईन मी निळा |
| पहातोय वाट तुझी मी |
| बनुनी अहिल्येची शीळा |
| झुंजताना मी तनकटाशी |
| इथे मोडला रे विळा |
| गेली सारी सुकून राने |
| भरु दे चांदण्याने मळा |
| गेला संपून हा प्रवास |
| आता उघडावे दार तिळा. |
| हुदयाच्या ही कैक कळा |
| तुला सांगेन मी आभाळा |
| पाहू तरी तुझ्यात आता |
| खरा आहे किती जिव्हाळा |
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